आसान नहीं थी कारगिल की जंग, पढ़ें पूरी कहानी

विजय दिवस के रूप में 26 जुलाई यानी आज कारगिल युद्ध की 22वीं वर्षगांठ देशभर में मनाई जा रही है। 1971 के युद्ध में मुंह की खाने के बाद लगातार छेड़े गए छद्म युद्ध के रूप में पाकिस्तान ने ऐसा ही छ्द्म हमला कारगिल में 1999 के दौरान किया। 18 हजार फीट की ऊंचाई पर कारगिल का यह युद्ध तकरीबन दो माह तक चला, जिसमें 527 वीर सैनिकों की शहादत देश को देनी पड़ी। 1300 से ज्यादा सैनिक इस जंग में घायल हुए। पाकिस्तान के लगभग 1000 से 1200 सैनिकों की इस जंग में मौत हुई। भारतीय सेना ने अदम्य साहस से जिस तरह कारगिल युद्ध में दुश्मन को खदेड़ा, उस पर हर देशवासी को गर्व है।

हिमाचल प्रदेश की वीर भूमि में जन्मे 52 वीर सैनिकों ने भी इस युद्ध में शहादत का जाम पिया। इन्हीं में से कुछ नाम ऐसे भी हैं, जिनकी वीर गाथा आज भी हर प्रदेश वासी की जुबान पर है। कैप्टन विक्रम बत्रा जब पहली जून 1999 को कारगिल युद्ध के लिए गए तो उनके कंधों पर राष्ट्रीय श्रीनगर-लेह मार्ग के बिलकुल ठीक ऊपर महत्वपूर्ण चोटी 5140 को दुश्मन फौज से मुक्त करवाने की जिम्मेदारी थी।

यह दुर्गम क्षेत्र मात्र एक चोटी ही नहीं थी यह तो करोड़ों देशवासियों के सम्मान की चोटी थी जिसे विक्रम बत्रा ने अपनी व अपने साथियों की वीरता के दम पर 20 जून 1999 को लगभग 3 बजकर 30 मिनट पर अपने कब्जे में ले लिया। उनका रेडियो से विजयी उद्घोष ‘यह दिल मांगे मोर….जैसे ही देश वासियों को सुनाई दिया हर एक भारतीय की नसों में ऐसा जज्बा भर गया और हर एक की जुबान भी यह दिल मांगे मोर… ही कह रही थी।

अगला पड़ाव चोटी 4875 का था यह अभियान भी विक्रम बत्रा की ही अगुवाई में शुरू हुआ। विक्रम बत्रा बहुत से पाकिस्तानी सैनिकों को मारते हुए आगे बढ़े लेकिन इस बीच वह अपने घायल साथी लेफ्टिनेंट नवीन को बचाने के लिए बंकर से बाहर निकल आए। ‘तुम बीबी- बच्चों वाले हो यहीं रुको बाहर मैं जाता हूं’ मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण वीर योद्धा कैप्टन विक्रम बत्रा के ये शब्द अपनी ही टीम के एक सुबेदार के लिए थे।

घायल लेफ्टिनेंट नवीन को बचाते हुए जब एक गोली विक्रम बत्रा के सीने में लगी तो भारत मां के इस लाल ने भारत माता की जय कहते हुए अंतिम सांस ली, इससे आहत सभी सैनिक गोलियों की परवाह किए बिना दुश्मन पर टूट पड़े और चोटी 4875 को आखिरकार फतह किया। इस वीरता के चलते 15 अगस्त 1999 को कैप्टन विक्रम बत्रा को परमवीर चक्र से नवाजा गया।

शहीदों की शहादत की कहानियां
बिलासपुर जिले से संबंध रखने वाले परमवीर चक्र विजेता संजय कुमार की वीर गाथा भी इसी तरह की है, संजय अपने 11 साथियों के साथ कारगिल में मस्को वैली प्वाइंट 4875 के फ्लैट टॉप पर तैनात थे। पाकिस्तानी सैनिकों ने ऊंचाई का फायदा उठाते हुए टीम के 8 सैनिकों को घायल कर दिया जबकि 2 शहीद हो गए। संजय को 3 गोलियां लग चुकी थी और राइफल भी खाली थी लेकिन फिर भी इस साहसी योद्धा ने घायल अवस्था में भी दुश्मन के बंकर में घुसकर उनकी ही बंदूक छीन कर दुश्मन के 3 सैनिकों को मार कर दूसरे मुख्य बंकर पर कब्जा कर लिया। इस अदम्य साहस के लिए संजय को भी परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

कुल्लू जिला के आनी से एक और वीर सैनिक डोला राम की वीर-गाथा भी देश प्रेम के लिए प्रेरित करती है। डोला राम ने अपने 2 साथियों की सहायता से बिना हथियारों के सियाचिन ग्लेशियर की चोटी पर बंकर में छिपे 17 घुसपैठियों को मौत की नींद सुला दिया। डोला राम देश के लिए शहीद होकर भी अमर हो गए।

कारगिल युद्ध में जब तक ब्रिगेडियर खुशहाल ठाकुर के नाम का जिक्र न हो तब तक यह विजयी गाथा अधूरी है। प्रदेश के कुल्लू व मंडी जिला की सीमा पर स्थित गांव नंगवाई से संबंध रखने वाले ब्रिगेडियर खुशहाल ठाकुर के नेतृत्व में सैन्य टीम ने तोलोलिंग चोटी पर कब्जा किया तो किसी ने नहीं सोचा था की यह पड़ाव इस युद्ध का टर्निंग प्वाइंट साबित होगा।

18 ग्रेनेडियर्ज के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल खुशहाल ठाकुर की इस कमान में सबसे अधिक सैनिकों ने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। इतनी बड़ी संख्या में नुकसान का सीधा कारण दुश्मन के ऊंचाई पर बैठ कर वार करना था। इस नुकसान से स्तब्ध कर्नल खुशहाल ठाकुर ने खुद कमान संभाली और विजयी रथ को मंजिल तक पहुंचा दिया। 13 जून का दिन था जब 18 ग्रेनेडियर्ज ने 2 राजपूताना राइफल्स के साथ मिलकर तोलोलिंग पर कब्जा किया। इस सफलता की भारी कीमत घायल लैफ्टिनैंट कर्नल विश्वनाथन ने कर्नल खुशहाल ठाकुर की गोद में अपने प्राण त्याग कर चुकाई थी।

कर्नल खुशहाल ठाकुर ने अपनी यूनिट के साथ पहले तोलोलिंग व फिर सबसे ऊंची चोटी टाइगर हिल पर विजय पताका फहराई। भारतीय सैन्य इतिहास में रिकार्ड बनाते हुआ इस विजय अभियान के लिए भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति ने 18 ग्रेनेडियर्ज को 52 वीरता सम्मानों से सम्मानित किया। इसी कमान के ग्रेनेडियर योगेंद्र यादव को मात्र 19 वर्ष की आयु में परमवीर चक्र से नवाजा गया।

कैप्टन सौरभ कालिया को कोई नहीं भुला सकता यदि यह कहा जाए कि विजय दिवस की गाथा का पहला पन्ना यहीं से शुरू होता है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। हिमाचल के इस सपूत ने कारगिल युद्ध शुरू होने से पहले ही अपनी जान देश के लिए कुर्बान कर दी। 5 मई 1999 का ही वह दिन था जब कैप्टन कालिया लद्दाख की एक पोस्ट पर अपने 5 अन्य साथियों के साथ गश्त कर रहे थे और उसी समय पाकिस्तानी फौज ने इन्हें बंदी बना लिया। 20 दिनों तक कैद में रखने के साथ इनके साथ तरह-तरह से अत्याचार किए गए।

उनके शरीर में जलती सिगरेट दागी गई, कानों में लोहे की गरम सलाखें डाल दी, शारीरिक यातनाएं दी गई। उनके शव को बुरी तरह से क्षत-विक्षत कर दिया गया, पहचान मिटाने के लिए चेहरे व शरीर पर धारदार हथियारों से कई बार प्रहार किया गया। कई निजी अंग काट दिए थे। देश के लिए अपनी संतान द्वारा शहादत देना हर किसी माता-पिता के लिए गर्व की बात होती है लेकिन जिस तरह कैप्टन कालिया से अमानवीय व्यवहार हुआ वह किसी के भी सीने को छलनी कर सकता है।

आज कारगिल युद्ध को 22वर्ष पूरे हो चले। यह बेहद गौरव की बात है कि देश इस युद्ध में शहीद हुए वीर सैनिकों को विजय दिवस मनाकर याद कर रहा है। देश का सैनिक जब सरहद पर होता है तो मातृभूमि ही उसके लिए उसका घर परिवार आदि सबकुछ होता है, इसकी हिफाज़त के लिए वह अपने प्राणों तक का बलिदान दे देता है। विजय दिवस एक दिवस मात्र ही नहीं यह सभी देशवासियों के लिए प्रेरणा दिवस भी है।