साल 2020 का असर देशभर में क्या-क्या हुआ, पढ़ें

कोरोना महामारी ने साल 2021 के जश्न को पूरी तरह फीका कर दिया। न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया में 2021 का आगाज वैसा नहीं हुआ जैसा पहले होता रहा है। भारत में मार्च 2020 में कोरोना वायरस का पहला केस सामने आया था। तब से अब तक देश ने जो कुछ भी देखा वो अभूतपूर्व रहा। कोरोना वायरस की लहर ने न सिर्फ अर्थव्यवस्था को पटरी से उतार दिया बल्कि लाखों लोगों का रोजगार भी छीन लिया। 2020 में हर तरफ दुख-दर्द की तस्वीर नजर आई।

लॉकडाउन के दौरान देश ने जो देखा वो भी पहली बार ही नजर आया। बसों-ट्रेनों के बंद होने से लाखों प्रवासी मजदूर पैदल ही अपने घरों के लिए निकल पड़े। सिर पर सामान की गठरी और साथ में छोटे-छोटे बच्चे, ये नजारा कभी न भुलाया जा सकेगा।

कई लोगों ने रास्ते में ही तड़पकर दम तोड़ दिया। कोरोना की चपेट में पहले शहर आए और फिर गांव। केंद्र और राज्य सरकारों ने सख्त उपाय कर इसे रोकने की कोशिश की। बावजूद इसके एक वक्त ऐसा भी था जब रोजाना करीब एक लाख मामले सामने आने लगे थे। अब इसकी रफ्तार में कमी आई है लेकिन खतरा बरकरार है। कोरोना वायरस के नए स्ट्रेन ने नई चिंता पैदा कर दी है।
लेकिन इन सबके बावजूद इस साल ऐसा भी हुआ जिसने बता दिया कि इंसान का जज्बा मजबूत हो तो हर मुश्किल उसके आगे छोटी ही पड़ जाती है। जो पीपीई किट भारत के लिए बिल्कुल नई चीज थी उसके उत्पादन में भारत ने रिकॉर्ड बना दिया। लोगों ने इस दौरान ऐसे-ऐसे काम किए जिस पर हर किसी को गर्व है।
2020 का असर देशभर में क्या-क्या हुआ
दिल्ली के लिए साल 2020 में कोरोना वायरस से जंग काफी मुश्किलों भरी रही, लेकिन कोरोना योद्धाओं और रणनीतिक फैसलों के माध्यम से राजधानी ने महामारी का डटकर सामना किया। दिल्ली में एक मार्च को कोरोना वायरस संक्रमण का पहला मामला सामने आया था जब इटली से लौटा पूर्वी दिल्ली का एक कारोबारी इससे संक्रमित पाया गया। 11 अप्रैल को संक्रमण के मामलों की संख्या एक हजार का आंकड़ा पार कर 1069 तक पहुंच गई जबकि उस दिन तक मृतकों की तादाद 19 थी। इसके बाद 27 अप्रैल को संक्रमितों की संख्या 3000 से आंकड़े को पार कर गई।
इसके बाद जैसे-जैसे लॉकडाउन बढ़ाया गया, वैसे-वैसे लोकनायक जयप्रकाश (एलएनजेपी) अस्पताल, राजीव गांधी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल, और गुरु तेगबहादुर (जीटीबी) अस्पतालों को कोविड-19 केंद्रो में तब्दील किया गया और निजी अस्पतालों को भी बढ़ते मरीजों के उपचार के लिये बिस्तरों का प्रबंध करने निर्देश दिया गया। राष्ट्रीय राजधानी में 23 जून को संक्रमण के पहले दौर के बारे में पता चला जब उस समय एक ही दिन में संक्रमण के सबसे अधिक 3,947 नए मामले सामने आए।
इसके बाद दिल्ली में युद्धस्तर पर तैयारियां की गईं। कोरोना योद्धाओं ने महामारी के खिलाफ जंग के सरकार के प्रयासों को आगे बढ़ाया और अस्पतालों और एंबुलेंस में सफेद लैब कोट, पीपीई किट पहनकर महामारी का सामना किया जबकि खाकी वर्दी वाले पुलिसकर्मियों ने लॉकडाउन का पालन कराने के लिए दिन रात काम किया।
लॉकडाउन के दौरान साफ नीले आसमान और स्वच्छ यमुना नदी की तस्वीरों सोशल मीडिया पर तैरने लगीं। खुशनुमा मौसम, साफ-सुथरी सड़कों और घरों ने महामारी के मनोवैज्ञानिक बोझ को कम करने में मदद की।
इस बीच 24 जून को दिल्ली मुंबई को पीछे छोड़कर भारत का कोरोना वायरस से सबसे बुरी तरह प्रभावित शहर बन गया। शहर में इस तारीख तक कोरोना वायरस संक्रमितों की संख्या 70 हजार से अधिक हो गई थी। राष्ट्रीय राजधानी में जब संक्रमण के मामलों में तेज उछाल देखा जा रहा था तब गृह मंत्री अमित शाह ने दिल्ली के स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार और कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिये खुद मोर्चा संभाला ।
दिल्ली की अदालतों को साल 2020 कुछ खास बदलाव देकर गया, जिन्होंने अभूतपूर्व कोविड-19 महामारी और लॉकडाउन की काट निकाली और दिल्ली के सांप्रदायिक दंगों और तबलीगी जमात के विदेशी सदस्यों के वीजा नियमों के कथित उल्लंघन जैसे महत्वपूर्ण मामलों की वीडियो कान्फ्रेंस के जरिए सुनवाई की।
वीडियो कान्फ्रेंस के जरिए सुनवाइयों का दौर शुरू होने से कुछ दिन पहले एक निचली अदालत को निर्भया सामूहिक बलात्कार व हत्या मामले के दोषियों की विभिन्न अर्जियों के चलते उन्हें फांसी पर लटकाने की तिथि में कई बार बदलाव करना पड़ा। संबंधित न्यायाधीश ने इन अर्जियों को ‘देरी करने का हथकंडा’ करार दिया। आखिरकार 20 मार्च सुबह साढ़े पांच बजे उन्हें फांसी के फंदे पर लटका दिया गया।
अदालत ने उनकी सभी अर्जियों पर सुनवाई करते हुए कहा कि एक दोषी को अपने सभी कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल करने का अधिकार है और कोई भी अदालत उनके मौलिक अधिकारों को नजरअंदाज नहीं कर सकती।
रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन, किसानों के आंदोलन से सुर्खियों में रहा कृषि क्षेत्र
कोरोना वायरस महामारी के बावजूद भारतीय कृषि क्षेत्र ने रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन और सकारात्मक वृद्धि हासिल की। लेकिन नए कृषि कानूनों के खिलाफ राष्ट्रीय राजधानी की सीमाओं पर बड़े पैमाने पर किसानों के विरोध प्रदर्शन ने कृषि क्षेत्र के उल्लेखनीय प्रदर्शन को फीका कर दिया।

 

ठंड के मौसम और महामारी की चिंताओं के बावजूद, मुख्य रूप से पंजाब और हरियाणा के हजारों किसानों का विरोध प्रदर्शन नवंबर के अंत में शुरू हुआ और यह अभी तक जारी है। गतिरोध को तोड़ने के लिए सरकार और लगभग 40 किसान यूनियनों के बीच अभी तक छह दौर की औपचारिक बातचीत हो चुकी है।

 

किसान यूनियनों के साथ वार्ता का नेतृत्व कर रहे केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर साल की समाप्ति से पहले कोई समाधान निकलने को लेकर आशान्वित थे, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। बाद में, तोमर ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि नये साल में संकट को समाप्त करने के लिए समाधान निकलेंगे।
सरकार और यूनियनों के बीच बुधवार को हुई आखिरी बैठक में, दोनों पक्ष प्रस्तावित बिजली संशोधन विधेयक तथा वायु प्रदूषण संबंधी अध्यादेश के बारे में चिंताओं के संदर्भ में आम सहमति पर पहुंचे हैं। यह अध्यादेश, किसानों को फसल अवशेष जलाने की स्थिति में उन्हें दंडित करता है।
सरकार ने किसानों द्वारा फसल अवशेषों को जलाने को गैर-आपराधिक करने का और बिजली सब्सिडी जारी रखने का भी आश्वासन दिया है। लेकिन दो विवादास्पद मुद्दों पर अभी कोई सहमति नहीं बन पाई है। ये दो मुख्य मांगे हैं – सितंबर में लागू किए गए तीन नये कृषि कानूनों को रद्द करना तथा एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) खरीद प्रणाली के लिए कानूनी गारंटी। अब, दोनों पक्षों को नए साल में इन दो मुद्दों का समाधान निकलने की उम्मीद है तथा इसके लिए दोनों पक्षों के बीच अगली वार्ता चार जनवरी को होने वाली है।

पश्चिम बंगाल के लिए वर्ष 2020 राजनीतिक अशांति, महामारी और प्राकृतिक आपदा का वर्ष रहा। राज्य में हालांकि, कोविड-19 और भीषण चक्रवात के मुकाबले राजनीतिक हलचल व तृणमूल कांग्रेस तथा भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच संघर्ष की खबरें अधिक सुर्खियों में रहीं।

राज्य में आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा ने जहां पूरी ताकत झोंक दी है, वहीं सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस भी उसे रोकने के लिए वार-प्रतिवार करती नजर आई। राजनीतिक हिंसा ने राज्य को राष्ट्रीय सुर्खियों में ला खड़ा किया। भाजपा ने दावा किया कि 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद से राजनीतिक हिंसा में उसके 130 से अधिक कार्यकर्ता मारे गए या रहस्यमय परिस्थितियों में मृत पाए गए।
तृणमूल कांग्रेस और भाजपा नीत केंद्र सरकार सालभर एक-दूसरे से टकराती रहीं। राज्य में राजनीतिक हिंसा इस स्तर तक जा पहुंची कि दिसंबर के शुरू में भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा के काफिले पर तब हमला हुआ जब वह पार्टी कार्यकर्ताओं की एक बैठक को संबोधित करने दक्षिण 24 परगना के डायमंड हार्बर जा रहे थे।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने नड्डा की सुरक्षा में कथित ढिलाई को लेकर राज्य में पदस्थ तीन आईपीएस अधिकारियों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर आने को कहा जिस पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी केंद्र से भिड़ गईं। नड्डा के काफिले पर हुए हमले में कई भाजपा नेता घायल हो गए।

केंद्रीय गृह मंत्री एवं भाजपा के दिग्गज नेता अमित शाह ने राज्य में कानून व्यवस्था की ‘‘बिगड़ती’’ स्थिति को लेकर राज्य सरकार पर हमला बोला और भाजपा ने आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर अपने केंद्रीय नेताओं को पश्चिम बंगाल में उतार दिया।

आतंकी हमलों के बीच भी खेल कभी नहीं रूके, जंग के दौरान भी खेलों की दुनिया इस तरह खामोश नहीं रही लेकिन कोरोना महामारी ने दुनिया भर में खेल गतिविधियों को ठप्प कर दिया। जीवन से खेल का उत्साह, जुनून और रोमांच चला गया। पूरे 2020 में खेलों की यही कहानी रही जब मैदान सूने पड़े रहे और खिलाड़ी वापसी के इंतजार में दिन काटते रहे।
यहां तक कि ओलंपिक खेल भी एक साल के लिये स्थगित करने पड़े। आखिरी बार युद्ध के दौरान ही खेलों के इस महाकुंभ को स्थगित करना पड़ा था। फुटबॉल के महानायक डिएगो माराडोना को भी वर्ष 2020 ने छीन लिया । अपने खेल, तेवर और करिश्मे से दुनिया भर के फुटबॉलप्रेमियों के दिलों पर राज करने वाले माराडोना के अचानक निधन से खेल जगत शोक में डूब गया । उनका निधन दिल का दौरा पड़ने से हुआ।

वहीं इस साल महेंद्र सिंह धोनी के संन्यास के साथ भारतीय क्रिकेट में एक युग का अंत हुआ। जब सारा देश आजादी की सालगिरह मना रहा था जब 15 अगस्त को सूर्यास्त के समय धोनी ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से विदा ली ।

पूरे साल कोरोना महामारी के कारण खेल गतिविधियां बंद रही। एक के बाद एक टूर्नामेंट रद्द या स्थगित होते रहे । इसका असर खेलों की आर्थिक सेहत और खिलाड़ियों की तैयारियों पर भी पड़ा।
क्रिकेट ने जरूर इस निराशा के बीच लोगों के चेहरों पर मुस्कुराहटें लाने का काम किया। यूएई में रिकार्ड टीवी दर्शक संख्या के साथ 53 दिन तक इंडियन प्रीमियर लीग का आयोजन किया गया। आम तौर पर सालाना जलसे की तरह खेले जाने वाले इस टूर्नामेंट में हालांकि मैदानों पर दर्शकों का शोर नहीं था और खिलाड़ी बायो बबल में थे।
बाकी खेलों में हालांकि अनिश्चितता का आलम रहा। तोक्यो ओलंपिक के लिये भारत की पदक उम्मीद खिलाड़ी या तो होस्टल के कमरों या अपने घरों में बंद रहे। अगले साल जुलाई अगस्त में होने वाले ओलंपिक की तैयारियां बाधित हुई और अब देखना यह है कि इसका असर खेलों में प्रदर्शन पर कितना पड़ता है।

राज्य का विशेष दर्जा खत्म होने और पिछले साल तत्कालीन राज्य के पुनर्गठन के बाद जिला विकास परिषद (डीडीसी) चुनावों के साथ 2020 के अंत में जम्मू कश्मीर में एक बार फिर चुनावों और राजनीतिक गतिविधियों की बहाली देखने को मिली।

केंद्र द्वारा 2019 में किए गए एक अहम संविधान संशोधन के बाद वर्ष 2020 की शुरुआत कुछ अनिश्चितताओं के साथ हुई थी जब प्रदेश में मुख्यधारा के अधिकतर राजनेता हिरासत में ही थे। राज्य के कुछ नेता जहां पहले दो महीनों में ही छूट गए। वहीं कोरोना वायरस महामारी की आमद के चलते मार्च में फारुख अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला समेत कई अन्य को छोड़ दिया गया।
पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती हालांकि सबसे ज्यादा समय 14 महीने तक कैद में रहीं और उन्हें डीडीसी चुनावों से ठीक पहले अक्टूबर में रिहा किया गया।
इस साल कोविड-19 से निपटने में प्रशासन का समय और संसाधन दोनों खूब लगे। इस महामारी से केंद्र शासित प्रदेश में 1.19 लाख लोग संक्रमित हुए तो वहीं करीब 1900 लोगों की जान चली गई।
देश में दिसंबर से फरवरी तक प्रमुख रूप से सर्दी का मौसम रहता है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के महानिदेशक एम मोहपात्रा ने कहा कि दिसंबर 2019 में उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में शुरू हुई भीषण सर्दी की स्थिति इस साल जनवरी में भी बरकरार रही।

2020 बीते 30 सालों के दौरान तीसरा सबसे ज्यादा बारिश वाला साल भी रहा। केरल में दक्षिण-पश्चिम मानसून एक जून को पहुंचा था जो इसकी सामान्य तारीख है। मानसून का आधिकारिक मौसम एक जून से शुरू होता है और 30 सितंबर तक रहता है।

देश में दीर्घावधि बारिश औसत (एलपीए) की 109 प्रतिशत बारिश हुई। आम तौर पर देश में जुलाई और अगस्त में अधिकतम बारिश होती है। मानसून की मुख्य विशेषताओं में इस बार अगस्त में हुई बारिश थी। इस महीने कम दबाव के पांच क्षेत्र बने जिनकी वजह से मध्य भारत में काफी बारिश हुई। इसकी वजह से ओडिशा, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, दक्षिण गुजरात और दक्षिण राजस्थान में बाढ़ जैसे हालात भी बने।