नए कृषि कानून: किसानों का डर और कृषि विशेषज्ञों के तर्क

नए कृषि कानून के बाद किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य न मिलने का डर है तो कृषि विशेषज्ञ बता रहे हैं कि कैसे किसान आशंकित हैं। मंगलवार को सरकार और किसानों के बीच होने वाली बातचीत से पहले पढ़े मनीष मिश्र की रिपोर्ट-

1. कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य ( संवर्धन एवं सुविधा) अधिनियम- 2020
सरकार: किसान जहां चाहें, उपज बेचे
प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और किसानों को बेहतर मूल्य मिलेगा। कृषि उत्पाद विपणन समिति (एपीएमसी) के बाहर एक बड़ा बाजार मिलेगा। किसान जहां चाहें उपज बेच सकते हैं। एक हजार से ज्यादा मंडियों को ऑनलाइन जोड़ा गया है। इनमें एक लाख से ज्यादा का कारोबार हो चुका है। एमएसपी पर उपज बेचने पर कोई रोक नहीं है। सरकार ने स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार, लागत का डेढ़ गुना एमएसपी दिया। पहले कुछ ही फसलों पर एमएसपी थी, अब संख्या बढ़ाई गई है।

किसान: फ्री डाटा की तरह होगा हाल
बिहार में 2006 में एपीएमसी एक्ट खत्म कर दिया था, वहां की स्थिति बद से बदतर है। वहां एमएसपी से आधे रेट पर उपज बिकती है। अगर शुरू में कुछ दे भी दिया तो बाद में समस्या बढ़ जाती है। मसलन कुछ कंपनियों ने जैसे नेट का डाटा शुरू में फ्री में दिया, बाद में रेट बढ़ा दिए। ऐसे में जो पोर्ट कराकर आए और पुरानी कंपनियों में जाना चाहा, तब तक पुरानी दुकानें बंद हो चुकी थीं। ऐसी ही हालात किसान की हो जाएगी। न मंडियां होंगी न एफसीआई बचेगा।
-राजिन्दर सिंह, किसान, करनाल

कृषि विशेषज्ञों का मत

महाराष्ट्र में तो पहले से ही प्राइवेट मंडियां हैं, वहां तो दाम नहीं मिल रहा है…….
किसानों को भटकाया जा रहा है। हम कृषि उपज को मंडी के बाहर बाजार में बेचने की सुविधा दे रहे हैं। जो बाहरी कंपनियां आएंगी तो दाम कैसे देंगी? महाराष्ट्र में तो पहले से ही प्राइवेट मंडियां हैं, वहां तो दाम नहीं मिल रहा है। कपास पर एमएसपी नहीं मिल रही। नीचे बिक रही है। जिस चीज के दाम बढ़ने लगते हैं सरकार उसका आयात करवा लेती है और दाम नीचे चला जाता है।
– विजय जवांदिया, किसान नेता और विशेषज्ञ

कॉरपोरेट आएगा तो छोटे किसान बाहर होंगे
जब कॉरपोरेट आएगा तो छोटे किसान बाहर होंगे। किसान यह बात समझता है। अगर अमेरिका का उदाहरण लें तो 1970 के दशक से अभी तक 93 फीसदी डेयरी फॉर्म बंद हो चुके हैं।फिर भी अमेरिका में दूध का उत्पादन बढ़ा है। क्योंकि कॉरपोरेट की एंट्री हो गई है। यही हाल भारत में होगा, क्योंकि ये मॉडल हम वहां से लेकर आए हैं। कॉरपोरेट फायदे में रहेगा इसलिए उछल रहा है।  – देविंदर शर्मा, कृषि अर्थशास्त्री

किसानों को डर… कहीं कॉर्पोरेट की कठपुतली न बन जाएं

2. कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) मूल्य आश्वासन अनुबंध एवं कृषि सेवा पर करार अधिनियम-2020

सरकार: खत्म होगी आढ़तियों और दलालों की मध्यस्थता
किसान सीधे कंपनियों के साथ जोड़कर कांट्रेक्ट खेती कर पाएंगे। जिससे उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिलेगा। दलाल और आढ़तियों की मध्यस्था खत्म होगी फसल खराब हुई तो कंपनी करार खत्म नहीं कर सकती। लेकिन किसान को करार तोड़ने का हक होगा। कंपनी का मुनाफा ज्यादा हुआ तो उसे अलग बोनस भी किसानों को देना होगा। अब जोखिम किसान का नहीं, कंपनी का होगा।

किसान: अनाज संकट की आशंका
देश में अनुबंध खेती लंबे समय से हो रही है कंपनी अपने महंगे बीज देती है खाद और दिशानिर्देश भी देती है किसान नकदी फसलों की ओर भागता है कंपनी अपने हिसाब से खेती कर आती है खाद्यान्न संकट न बढ़ जाए। लागत बहुत लग जाती है। खुद के बीज भी खत्म हो जाएंगे। गुणवत्ता के आधार पर नहीं भी खरीदती है।

कंपनी उसे खरीदने के लिए नखरे करती है उसी गुणवत्ता में पहुंचाना होता है किसान उतना तकनीकी जानकर नहीं के मानकों पर खरा उतर पाए। पंजाब में किसानों का माल कंपनी ने नहीं खरीदा तो खुले बाजार में भेजना पड़ा।पूरे के पूरे गांव में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कराती है गांव में खाद्यान्न संकट आ सकता है एक जगह एक ही तरह की फसलें होने लगेंगी।
– सोनू शर्मा किसान, मंगरौली, बुलंदशहर

कृषि विशेषज्ञों का मत

फेल हो गई अनुबंध खेती

विजय जवांदिया, किसान नेता एवं विशेषज्ञ
वर्ष 1986 में पंजाब में ही अनुबंध खेती शुरू हुई थी। पेप्सी-कोला कंपनी ने किसानों से आलू और सब्जी की खेती कराई। बाद में गुणवत्ता को लेकर आना खानी शुरू कर दी। फसल की गुणवत्ता मौसम पर निर्भर है। इसी तरह पंजाब में जब बासमती चावल टूटने लगा तो कंपनी ने माल लेने से मना कर दिया। सरकार कहती है कंपनियां जमीन गिरवी नहीं रख सकती लेकिन किसानों के हित के लिए राजस्व अधिकारी कैसे निर्णय लेंगे।

किसान निर्धारित मूल्य चाहता है

देवेंद्र शर्मा, कृषि अर्थशास्त्री-
सबसे पहले पंजाब में ही लोगों ने अनुबंध खेती से हाथ खींचे बस आप हमें एमएसपी दीजिए इसके नीचे खरीद गैरकानूनी करें पूरी दुनिया में किसान बाजार के उतार-चढ़ाव से ही परेशान हैं।किसान एक निर्धारित मूल्य चाहता है आज किसान को सीधे समर्थन की जरूरत है किसान की अब आम 18000 रुपये प्रतिमाह हो। पीएम किसान निधि की योजना अच्छी पहले किसान आए मांग रहा है और उन्हें बाजार के हवाले कर देते हैं। क्या अर्थशास्त्रियों और नौकरशाहों का वेतन पैकेज भी बाजार के साथ लिंक किया जा सकता है? अगर बाजार इतना अच्छा है तो इन्हें क्या दिक्कत है? किसान को भी दिक्कत नहीं होगी।

3. आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून-2020

सरकार का तर्क: निवेश बढ़ेगा, किसानों को लाभ
सरप्लस कृषि उत्पादों के सरप्लस होने और कोल्ड स्टोरेज, वेयर हाउस, प्रोसेसिंग यूनिट एवं एक्सपोर्ट में निवेश में कमी के कारण किसानों को बेहतर मूल्य नहीं मिल पाता। स्टॉक सीमा हटने से निजी क्षेत्र का इस और विनिवेश बढ़ेगा और किसानों उपभोक्ताओं की इसमें इससे लाभ मिलेगा। समय आ गया है कि ब्रांड इंडिया दुनिया के किसी बाजारों में प्रतिष्ठा के साथ स्थापित हो। किसान बिस्किट, चिप्स, जैम दूसरे कंजूमर उत्पादों की वैल्यू चैन का हिस्सा भी बन सकते हैं।

किसान का कहना है: हमारा माल खरीदेगा कौन?
इसमें पूंजीगत स्टॉक करेंगे, जहां सस्ता मिलेगा वहां से ले लेंगे। सस्ता आयात करके सस्ता बेचने से देश के किसान का माल खरीदेगा कौन? किसान को और सस्ते से में बेचना पड़ेगा। एक तरह से मार्केट को कंट्रोल कर लेंगे। निजी कंपनियों के इशारों पर मार्केट का रेट तय होगा। मिलावट भी बढ़ेगी अभी आरती कम कर रहे हैं जब बड़े लोग आ जाएंगे तो कंट्रोल बिल्कुल भी नहीं रहे हो।
– सुमित छिकारा, किसान, कनौदा, झज्जर, हरियाणा

कृषि विशेषज्ञों का मत

कंपनियां आयात करेंगी तो किसान मरेगा

विजय जवांदिया, किसान नेता एवं विशेषज्ञ-
प्रावधान है कि अनाज के 50 प्रतिशत दाम बढ़ने पर सब्जी और फल में 100 प्रतिशत दाम बढ़ने पर वह तिलहन दलहन में 50 प्रतिशत से अधिक दाम बढ़ने पर सरकार दखल देगी लेकिन सरकार तय करेगी। दाम एमएसपी से कम न मिलें। अब बाजार में दाम बढ़ने शुरू हुए तो सरकार ने आयात शुरू कर दिया जबकि विदेशों में ऐसा नहीं होता। निजी कंपनी आएंगे तो जितनी दाल मिल को साल भर की जरूरत होगी तो उतनी इखट्टा करके रख लेंगी।

किसानों से नया खरीदने पर उनका नुकसान होगा, निर्यात होगा तो वह उपभोक्ता पर मार पड़ेगी। अगर कंपनी निर्यात के लिए खरीद रही है तो कानून नहीं लागू होगा। जब जो स्टॉक बनाकर रख लेगा। वह उसे निकालकर फसल के समय बाजार में दाम गिरा देगा, और फिर स्टॉक कर लेगा इस पर सरकार कैसे नियंत्रण करेगी?

जितना मर्जी हो आप स्टॉक कर लो

देविंदर शर्मा, कृषि अर्थशास्त्री-
जब स्टॉक लिमिट नहीं होगी तो जितना मर्जी हो आप स्टॉक कर लो। उपभोक्ता को तो उतना नुकसान नहीं होगा क्योंकि जब कीमतें बढ़ती हैं तो सरकार आयात करके दुकानें खोलती हैं। जब सस्ता होता है तो सरकार ने क्या किया? जब किसान अपना उत्पाद सड़कों पर फेंकता है तो सरकार ने क्या किया? क्या किया प्राइवेट प्लेयर्स ने?