भगवान परशुराम से मिलने आती हैं मां रेणुका, पढ़े पूरी कहानी

फाइल फोटो

 रेणुका झील हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में स्थित है और यह समुद्र तल से 672 मीटर ऊपर है। रेणुका झील नाहन से 37 किमी दूर और पॉँवटा साहिब से 60 किलोमीटर दूर स्थित है, जो 2.5 किमी दूर है।भारतीय हिमालय के हरे भरे वनों के बीच स्थित, झील के परिवेश ट्रेकिंग और पर्वतारोहण जैसे साहसिक खेलों के लिए पर्यटकों के लिए एक उत्कृष्ट स्थान प्रदान करता है।रेणुका झील के मैदान पर मछली पकड़ने और हिमाचल प्रदेश के पर्यटन और पर्यटन विभाग द्वारा भी अनुमति है।

रेणुका झीलों के आसपास के पहाड़ पौधों और पशु जीवन के विभिन्न प्रकारों का समर्थन करते हैं। इस क्षेत्र में जंगली जीवन की बहुतायत की उपलब्धता को देखते हुए, हिमाचल प्रदेश की राज्य सरकार ने एक मिनी चिड़ियाघर का निर्माण किया है।सार्वजनिक दृश्य के लिए चिड़ियाघर में विभिन्न प्रकार की प्रजातियां हैं, उनमें से कुछ हिमालयी काली बियर, स्पॉटर हिरण, बीयरिंग करने वाली बीयर और कई अन्य विशिष्ट प्रजातियां हैं। प्रकृति की महिमा के अलावा, इसमें समग्र मूल्य भी हैं हिमाचल प्रदेश के लोकप्रिय मंदिर में से एक, रेणुकाजी इस झील के तट पर स्थित है।साहसिक दुनिया भर के स्थलों के लिए साहसिक खेल और पर्यटन स्थलों का भ्रमण करने के लिए झुंड।

झील जो लगती है नारी स्वरूप 
रेणुका झील को स्थानीय लोग माता रेणुका का प्रतीक मान कर पूजते हैं। रेणुका झील हिमाचल प्रदेश की सबसे बड़ी प्राकृतिक झील है लोक-मान्यता है कि ऋषि जमदग्नि की पत्नी और परशुराम की माता रेणुका मृत्यु के बाद जल स्वरूप होकर झील बन गई थीं। इसलिए झील का आकार नारी शरीर की तरह है।झील के दोनों ओर विशिष्ट पर्वत हैं। ददाहू की ओर से दाईं ओर के पर्वत का नाम धार टारन है। दूसरी ओर का पर्वत महेंद्र पर्वत के नाम से प्रसिद्ध है। रेणुका से जम्मु गाँव जाते समय एक टीला मिलता है जिसे तपे का टीला बोलते हैं। लोगों के अनुसार इसे तपे का टीला इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस टीले पर भृगु का आश्रम था। इस पर जमदग्नि ऋषि ने तपस्या की थी। माता के पैरों के पास आकर परिक्रमा पूरी हो जाती है। इस स्थान को “शालीपाल” कहते हैं।

रेणुका झील

रेणुका में चार मंदिर हैं- परशुराम मंदिर, परशु रामेश्वर मंदिर, माता रेणुका मंदिर और दशावतार मंदिर। रेणुका मंदिर मे देवी की तीन प्रतिमाएं तीन रूपों को दर्शाती हैं। बीच में लाल साड़ी पहने माता रेणुका के सिर पर मुकुट है। उनके एक ओर राजकुमारी रेणुका और दूसरी ओर साध्वी रेणुका की। परशुराम मंदिर में शिवपूजा में लीन परशुराम की सुंदर प्रतिमा है। शिवलिंग पंचमुखी है और उस पर नाग लिपटा हुआ है। दाईं ओर नंदी विराजमान हैं

मां-पुत्र के पावन मिलन का श्री रेणुका जी मेला हिमाचल प्रदेश के प्राचीन मेलों में से एक है। जो हर वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की दशमी से पूर्णिमा तक उत्तरी भारत के प्रसिद्ध तीर्थ स्थल श्री रेणुका में मनाया जाता है। जनश्रुति के अनुसार इस दिन भगवान परशुराम जामूकोटी से वर्ष में एक बार अपनी मां रेणुका से मिलने आते हैं। यह मेला श्री रेणुका मां के वात्सल्य व पुत्र की श्रद्धा का एक अनूठा संगम है।

चांदी से सुसज्जित भव्य पालकियां, हजारों भक्तों की भीड़, चारों ओर मां रेणुका और भगवान परशुराम का जय उद्घोष और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की मधुर ध्वनियों से मां-पुत्र के पारंपरिक एवं भव्य मिलन की बेला आ गई है। इस वर्ष यह मेला रेणुका जी तीर्थाटन पर 13 से 19 नवंबर तक परंपरागत ढंग से मनाया जा रहा है। श्री रेणुका जी तीर्थ स्थल में मां-पुत्र का मिलन होगा और इस अलौकिक पल के गवाह बनेंगे हजारों श्रद्धालु।

मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर  देव पालकियों को कंधा देकर मेले का विधिवत शुभारंभ कर शोभायात्रा की अगुवानी करेंगे। जामू मंदिर से लाई गई भगवान परशुराम की चांदी से जड़ित पालकी को वह कंधा देकर रेणुका जी झील के लिए रवाना करेंगे। जहां भगवान परशु राम का मां से भव्य मिलन होगा। अंतरराष्ट्रीय रेणुका मेला यह 6 दिन तक चलेगा।

मां रेणुका जी और भगवान परशुराम के इस ऐतिहासिक मिलन को देखने के लिए हिमाचल ही नहीं बल्कि उत्तर भारत से भक्तों की भीड़ उमड़ेगी। एकादशी को रेणुका झील में पवित्र स्नान होगा। जिसमें उत्तर भारत विशेषकर पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड के हजारों श्रद्धालु पहुंचेंगे।

जबकि पूर्णिमा के दिन होने वाले स्नान में अधिकतर हिमाचल के श्रद्धालु शरीक होंगे। श्री रेणुका जी मेला हिमाचल प्रदेश के प्राचीन मेलों में से एक है। यह मां-पुत्र के मिलन का प्रतीक है। जो हर वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की दशमी से पूर्णिमा तक उत्तरी भारत के प्रसिद्ध तीर्थ स्थल श्री रेणुका में मनाया जाता है। इस वर्ष नौ से 14 नवंबर तक मनाया जा रहा है।

मां से किया वादा निभाने आते हैं परशुराम
जनश्रुति के अनुसार प्राचीन काल में भृगुवंश के महर्षि ऋचिक के घर महर्षि जमदग्नि का जन्म हुआ था। जमदग्नि ऋषि तपे का टीला में रहते थे। उनके पास कामधेनु गाय थी। भगवान दत्तात्रेय से एक हजार भुजाओं का वरदान पाने वाले राजा अर्जुन एक दिन जमदग्नि के पास कामधेनु मांगने पहुंचे।

कामधेनु नहीं देने की विवशता बताने के बावजूद गुस्साए सहस्त्रबाहु (राजा अर्जुन) ने महर्षि जमदग्नि की हत्या कर दी। मां रेणुका शोकवश राम सरोवर में कूद गई। सरोवर ने मां रेणुका की देह को ढकने का प्रयास किया। जिससे इसका आकार स्त्री देह के समान हो गया। परशुराम अति क्रोध में सहस्त्रबाहु को ढूंढने निकले और सेना सहित सहस्त्रबाहु का वध कर दिया।

भगवान परशुराम ने अपनी योगशक्ति से पिता जमदग्नि तथा मां रेणुका को जीवित कर दिया। परशु राम ने माता रेणुका को वचन दिया था कि प्रतिवर्ष कार्तिक मास की देवोत्थान एकादशी को मिलने आएंगे। इसी बचन का पालन करने वह हर साल आते हैं।