प्रख्‍यात पहाड़ी नाटियां के लेखक लायक राम रफीक का निधन

“फूकने दे पोहेले मेरा जीयू ओरा टाले
रेके री अमान एंयी आगिए ना जाले”

काफी समय से बीमार चल रहे मशहूर लेखक लायक राम रफीक ने आज दुनिआ को अलविदा कह दिया। पारंपरिक गीतों के पीछे हमेशा कोई इतिहास छिपा होता है। युवा कलाकारों को इस इतिहास की पूरी जानकारी बुजुर्गों से लेकर गीतों को प्रस्तुत करना चाहिए। इसके साथ ही गीतों में सार, तत्व और शिक्षाप्रद होने से ही उसकी सार्थकता होती है। यह बात प्रदेश के रचनाकार लायक राम रफीक ने कही। ठियोग के नरयाह गांव में जन्में 75 साल के लायक राम रफीक किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं।

वह हर तरह के भजन और पहाड़ी नाटियां लिख चुके हैं। लायक राम रफीक लगभग 2500 गीत लिखकर कई पहाड़ी गायक और कलाकारों को बुलंदियों तक पहुंचा चुके हैं। वह स्वयं भी रेडियो स्टेशन पर कैजुअल कलाकार के रूप में अपनी आवाज का जादू बिखेर चुके हैं। बचपन से ही फिल्मी संगीत के दीवाने रहे वरिष्ठ पहाड़ी गीतकार ने बताया कि फिल्मी संगीत की तर्ज पर पहाड़ी गीत-संगीत को भी संगीत पटल पर उतारना चाहिए।

उन्होंने बताया कि बचपन में वह ठियोग की लाईब्रेरी में किताबें पढ़ा करते थे, जहां से उन्हें गीत लिखने की प्रेरणा मिली। इन्हें अधिक पहचान ‘रोइयों रातड़ी काटे नैरे सघियां’ नामक गीत से मिली। सकरोहा स्थित साउंड एंड साउंड स्टूडियो में रफीक ने टी सीरीज के लिए माता की भेंटें भी लिखी हैं। इनका प्रसिद्घ गीत ‘सुपने दे मिली आमिया तू मेरिये’ आज तक लोगों की जुबान पर रहता है।

उन्होंने कहा कि छोटी काशी से उनका विशेष लगाव रहा है और यहां से उन्होंने बहुत कुछ सीखा है। 75 वर्षीय रचनाकार को कई अवार्डों से भी नवाजा जा चुका है। इनमें हिम उत्कर्ष संस्था की ओर से स्टेट लेवल पर हिमाचल श्री अवार्ड और नौ दिसंबर को बांबे की एक संस्था की ओर से उन्हें दिया गया लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड प्रमुख हैं।