दुनिया के लिए टीचर बने ये बच्चे: कोई अधिकारों के लिए खड़ा हुआ, किसी ने सात साल की उम्र में किया ऑपरेशन

भारत में 5 सितंबर का दिन शिक्षक दिवस के तौर पर मनाया जा रहा है। इस मौके पर देशभर में बच्चे अपने शिक्षकों के प्रति अलग-अलग तरह से अभिवादन प्रकट कर रहे हैं। एक शिक्षक का अर्थ आमतौर पर किसी ऐसे व्यक्ति से लगाया जाता है, जिसके पास अपने क्षेत्र में ज्ञान का भंडार हो या वह अनुभवी हो। इसका सीधा सा अर्थ है कि कोई ऐसा व्यक्ति जिसने उम्र के कई पड़ावों में ज्ञानर्जन किया है, वही असली शिक्षक है। हालांकि, धीरे-धीरे यह धारणा या तो बदल रही है या इसे चुनौती दी जा रही है। अमर उजाला पेश कर रहा है ऐसे ही छह युवाओं के नाम जिन्होंने कम उम्र के बावजूद अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया और पूरी दुनिया को सीख देकर खुद को शिक्षक के तौर पर पेश किया।
पायल जांगीड
राजस्थान की रहने वाली पायल जांगीड भारत के उन कुछ लोगों में शामिल हैं, जिन्हें बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन की तरफ से पुरस्कार मिला है। दो साल पहले ही उन्हें अमेरिका के न्यूयॉर्क में रखे गए इवेंट में ग्लोबल चेंजमेकर के सम्मान से नवाजा गया था। पायल को यह पुरस्कार उनके बाल श्रम और बाल विवाह को रोकने से जुड़े अभियानों के लिए दिया गया था। बताया जाता है कि इन सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़ने का पायल का जज्बा किसी बाहरी घटना को देखकर नहीं, बल्कि अपने ही अनुभवों के कारण आया था। दरअसल, जांगीड ने पहले अपनी और फिर अपनी बहन के बाल विवाह किए जाने के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी।

अपने साथ हुई इसी घटना के बाद पायल ने बच्चों के बचपन को बचाने का बीड़ा उठाया। बाद में पायल ने अपने क्षेत्र में बाल पंचायत शुरू की, जिसमें आसपास के गांव के बच्चों का जुटना भी शुरू हो गया। यह बाल पंचायत ग्राम पंचायत के साथ मिलकर काम करती है और बच्चों के मुद्दे उठाती है। पायल को अपनी इन्हीं कोशिशों के लिए 2013 में बाल अधिकार के विश्व बाल पुरस्कार में ज्यूरी सदस्य के तौर पर भी शामिल किया था।
ओमप्रकाश गुर्जर
ओम प्रकाश गुर्जर की कहानी भी काफी हद तक पायल जांगीड की तरह ही है। राजस्थान में पले-बढ़े ओमप्रकाश को बचपन में ही बालश्रम के दलदल में धकेल दिया गया था। पांच साल से लेकर आठ साल की उम्र तक ओम ने दुकानों पर काम कर के गुजर-बसर किया, लेकिन बाद में उन्होंने बालश्रम की चपेट में आने वाले बच्चों को निकालने का फैसला किया। अपनी इन्हीं कोशिशों के चलते ओमप्रकाश को महज 14 साल की उम्र में अंतरराष्ट्रीय बाल शांति पुरस्कार से नवाजा गया था।

बचपन बचाओं आंदोलन की वजह से ओम को आजादी की अवधारणा को करीब से जानने का मौका मिला और इसके बाद उन्होंने बाल अधिकार से जुड़े कई अभियानों में हिस्सा लिया। ओपी अब तक सैकड़ों बच्चों को मुफ्त शिक्षा दिलाने में अहम भूमिका निभा चुके हैं। यहां तक कि उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया है।
मलाला युसफजई
पाकिस्तान की इस 24 साल की सामाजिक कार्यकर्ता को दुनियाभर में महिलाओं की शिक्षा और उनके अधिकारों के लिए काम करने के लिए जाना जाता है। मलाला 17 साल की उम्र में ही नोबेल का शांति पुरस्कार जीत चुकीं थीं, हालांकि उनकी पहचान इस सम्मान तक ही सीमित नहीं थीं। दरअसल, मलाला लड़कियों के हक के लिए उस समय से लड़ रही हैं, जब पाकिस्तान में तालिबान ने लड़कियों की शिक्षा पर प्रतिबंध लगा दिया था।

मलाला ने बेहद छोटी उम्र में लेखन का कार्य शुरू कर दिया था। इन लेखों और ब्लॉग में वे अपना छद्म नाम ‘गुल मकई’ इस्तेमाल करती थीं। बाद में 11 साल की उम्र में ही उन्होंने बीबीसी उर्दू के लिए लिखना शुरू कर दिया। इन लेखों में वे तालिबान शासन में लड़कियों की पढ़ाई में आ रही दिक्कतों का जिक्र करती थीं और उन्हें घर में ही रोके जाने को लेकर सवाल भी पूछती थीं। अपने इसी निडर रवैये की वजह से इस्लामी आतंकियों ने उन्हें स्कूल जाते वक्त गोली मार दी थी। हालांकि, तब 15 साल की मलाला ने सिर पर गोली लगने के बावजूद मौत से जंग जीत ली।

इस घटना के बाद मलाला ने लड़कियों के हक की अपनी जंग का दायरा सिर्फ पाकिस्तान तक नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में बढ़ाया। मलाला ने नाइजीरिया में बोको हराम की विचारधारा से प्रभावित लड़कियों के हक में भी आवाज उठाई। मौजूदा समय में वे महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली सबसे युवा कार्यकर्ता हैं।