जासूसी कांड: राहुल भी जानते होंगे कि इस पर कब-कब आया है सियासी भूचाल

बात हमेशा की जाती रही है। फर्क इतना है कि जासूसी की तकनीक बदल गई है। नई-नई तकनीक आने से जासूसी कराने के तरीके भी बदल गए हैं। जासूसी कांड में कभी राष्ट्रपति, कभी प्रधानमंत्री तो कभी मुख्यमंत्रियों तक का नाम सामने आया। जासूसी कांड के कारण आरोपों की वजह से कभी केंद्र तो कभी राज्य सरकारें तक गिर गईं।

जासूसी कांड के कुछ प्रमुख किस्सेपेगासस स्पाईवेयर के जरिए पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और नेताओं की कथित जासूसी को लेकर कांग्रेस समेत तमाम विपक्ष सरकार पर हमलावर है। विपक्ष संसद चलने नहीं दे रहा। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी इसे लेकर तीखे तेवर अपनाए हुए हैं, क्योंकि सरकार पर उनके भी फोन की जासूसी कराने के आरोप हैं। वे चाहते हैं कि सरकार संसद में इस पर जवाब दे और देश को बताए कि पेगासस के जरिए भारत में जासूसी कराई गई या नहीं।

भारतीय राजनीति में जासूसी की यह बात नई नहीं है। इतिहास देखें तो यह बात समझ में आती है कि जासूसी और भारतीय राजनीति का एक गठबंधन होने की

जब राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह को अपने कमरे की जासूसी का शक हुआ
बात 1984 से 1987 की है। उस समय केंद्र में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार थी और राष्ट्रपति थे ज्ञानी जैल सिंह। बताया जाता है कि उस समय प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के बीच कुछ मुद्दों को लेकर अनबन चल रही थी। उसी दौरान ज्ञानी जैल सिंह को यह शक हुआ था कि राष्ट्रपति भवन के कुछ कमरों की जासूसी हो रही है।

हेगड़े को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा
1988 का यह मामला काफी सुर्खियों में रहा था। दरअसल कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री रामकृष्ण हेगड़े पर यह आरोप लगा कि वे अपने विरोधियों के फोन की टेपिंग करा रहे हैं। उस समय हेगड़े गैर कांग्रेसी नेताओं में काफी ताकतवर माने जाते थे। कहा ये भी जाता है कि हेगड़े प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा रखते थे। जब उनके विरोधियों की फोन टैपिंग होने की बात सामने आई तो काफी हो-हंगामा मचा। उस समय केंद्र में राजीव गांधी की सरकार थी। मामले की जांच के आदेश दिए गए। जांच में यह बात सामने आई कि 50 से ज्यादा नेताओं और व्यापारियों के फोन रिकॉर्ड किए गए थे और यह आदेश कर्नाटक पुलिस के डीआईजी ने दिए थे। विवाद इतना बढ़ गया कि हेगड़े को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा।