छात्र संघ चुनाव का महत्व

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है । लोकतंत्र का आधार स्वतंत्रता समानता सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा है । राजनीतिक सता के लिए स्वस्थ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बहुदल व्वस्था और लोकतंत्र में ज़रूरी है । आज समस्त दुनिया में लोकतंत्र के सार्थकता पर चर्चा हो रही है ।

क्या लोकतंत्र वास्तव में सबसे बेहतर शासन प्रणाली है ?

या मोज़ूदा विकल्पों में लोकतंत्र सबसे अच्छी शासन प्रणाली है ? या लोकतंत्र का क्या विकल्प हों सकता है ? अमेरिकी लेखक फूँकूयामा ने तो उदार लोकतंत्र को सबसे बेहतर शासन प्रणाली घोषित कर दिया है । अपनी मुख्य कृति the end of history and last man में । लेकिन उसका पुरज़ोर विरोध हुआ फूँकूँयामा का तर्क था की उदार लोकतंत्र में वो सब गुण है जिसकी तलाश मानव ने आज तक की वो श्रेष्ट मिल चुका है । और अब सेधांतिक संघर्ष ख़त्म हो चुका है । लेकिन ज़मीनी सचाई क्या है यह अभी भी देखना है । भारत में लोकतंत्र के प्रति सम्मान है । इंदिरा गांधी को छोड़कर सभी ने लोकतंत्र की रक्षा में अपनी भूमिका प्रदान की है ।

आपातकाल के बाद देश की जनता ने साफ़ कर दिया की लोकतंत्र में ही देश की जनता की गहरी आस्था है । सवाल यह है की असल में देश में लोकतांत्रिक मूल्यों का शिक्षण कहा से होता है ? और व्यवस्था के प्रति सम्मान कहा से जागृत होंगा । तो शिक्षण सस्थानो का नाम सबसे आगे होंगा । छात्र संघ चुनाव देश के अनेक बड़े विश्वविधालय में बंद है । हिमाचल। प्रदेश विश्वविधालय में भी सरकार और विश्वविधालय प्रशासन ने निर्णय दे दिया है की चुनाव नहीं होंगे । बल्कि राज्य के मुख्य छात्र संगठन ए॰बी॰बी॰पी॰ एनएसयूआई एसएफ़आई तीनो इसके समर्थन में है । प्रत्यक्ष छात्र संघ चुनाव केवल छात्र समस्यो को सुलझाने मात्र का ज़रिया नहीं है ।

प्रत्यक्ष छात्र संघ चुनाव की महता बहुत जयदा है । लोकतांत्रिक प्रणाली की सिख देश की युवा पीढ़ी को छात्र राजनीति में प्रत्यक्ष भाग लेने से मिलती है । राजनीतिक सामाजिककरण को बड़वा इस प्रक्रिया द्वारा मिलता है । अन्यथा देश की युवा पीडी हमारी राजनीतिक व्यवस्था के कार्य करने लोकतांत्रिक प्रक्रिया से अनजान है ।

राजनीतिक व्यवस्था केसे कार्य करती है । लोकतंत्र केसे मज़बूत किया जा सकता है । छात्र राजनीति का इसमें विशेष महत्व है । भारत जेसे लोकतांत्रिक देशों में शिक्षण संस्थानो में लोकतांत्रिक प्रक्रिया से छात्रों को दूर रखना कहा तक उचित है । इस से देश की राजनीतिक व्यवस्था के प्रति युवा वर्ग में अराजक महोल और अविश्वास पेदा हो रहा है । छात्र संघ चुनाव लोकतांत्रिक मूल्यों के पोषण की नर्सरी है । इसको केवल छात्र हितो तक कैम्पस राजनीति तक देखना छात्र राजनीति के उदेशय से न्याय नही है । समय समय पर सरकारों ने तर्क पेश किया है की छात्र राजनीति में हिंसा के कारण बंद किया जाता है । यह तर्क सरकार का कुछ हद तक सही है । लेकिन देश की राजनीति में कितनी राजनीतिक हत्याएँ होती है उस पर सवाल नहीं होते यह उचित तर्क नहीं है की हिंसा से बचने के लिए आप राजनीतिक सामाजिककरण जेसे महत्वपूर्ण पक्षों को दरकीनार करों राजनीतिक संस्कृति जेसे पक्षों की बलि केवल छूटमूट हिंसा के डर से दो । इसके दूरगामी परिणाम कैम्पस हिंसा से जयदा घातक है । इस बात को सरकारों को समझना पड़ेगा । अब सवाल यह भी है की जब हिमाचल में वीरभद्र सरकार ने चुनाव बंद किए तो तत्कालीन विपक्ष बीजेपी ने इसका विरोध किया अपने घोषणापत्र में प्रत्यक्ष छात्र संघ चुनाव बहाल करने की बात कही । सता परिवर्तन हुआ बीजेपी सरकार बनी लेकिन छात्र और शिक्षा क्षेत्र के मुख्य मुद्दे में कोई परिवर्तन नहीं हुआ । भाजपा सरकार साफ़ अपने वादे से मुकरी यह बहुत दुखद है की वास्तव में छात्र किस पर भरोसा करे ।

क्या केवल राजनीतिक दलो को शिक्षा क्षेत्र के मुद्दों से फ़र्क़ नहीं पड़ता ?

या सरकारें अपने विरोध में कोई स्वर नहीं सुन सकती है ? यह बड़ा सवाल है । सवाल यह भी है कि छात्र राजनीति से निकले चेहरे बड़ी राजनीति में भी सफल हुए है इसके अनेक तर्क है जेसे विश्व के सबसे बड़े राजनीतिक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नाड्ड जी भी हिमाचल विश्वविधालय में छात्र नेता रहे । हिमाचल कोंगेस के अध्यक्ष कुलदीप राठोर भी छात्र नेता रहे । प्रदेश में एक मात्र सीपीआईएम के विधायक राकेश सिंघा भी छात्र नेता रहे है ।

हर राजनीतिक दल की शक्ति राजनीति में विश्वविधालय से निकले छात्र नेता विराजमान है । क्या असल कारण यही है की समय समय पर छात्र राजनीति सता के निशाने पर रही है । लेकिन इस बात पर मत स्पष्ट करना पड़ेगा की छात्र राजनीति का योगदान केवल कैम्पस राजनीति तक सीमित नहीं है । आज एबीवीपी छात्र संगठन ने शक्ति राजनीति में न केवल प्रदेश बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी संख्या में दूरदृष्टि वाले नेता प्रदान किए है ।

इस बात को नकारा नहीं जा सकता है । इस स्तर में एनएसयूआई छात्र संगठन के परिणाम भी संतोषजनक है छात्र राजनीति का आधार तप है । ज़मीनी हक़ीक़त है । आज देश के राष्ट्रीय स्तर के जितने बड़े नेता है वो छात्र राजनीति से निकले चेहरे है । इस बात को नही भूलना चाहिए ।

भारत में व्यवस्था के प्रति आस्था लोकतंत्र के प्रति गहरा चिंतन विश्वविधालय में होता है । देश की शासन प्रणाली को केसे बेहतर किया जा सकता है । इसका चिंतन छात्र कर रहे है । लेकिन अगर उनको वहवहारिक पक्ष से दूर रखा जाए तो परिणाम अपेशा के अनुरूप नहीं होंगे । इस बात को देखना पड़ेगा । छात्र संघ चुनाव के पीछे का आधार बहुत विस्तृत है । यह स्पष्ट है । समाज केंद्रित नेत्रव की नीव यही पड़ती है । राजनीतिक संस्कृति का विस्तार यही पलता है । यह भी सचाई है । राजनीतिक समजीकरण के क्षेत्र में भी छात्र संघ चुनाव का बड़ा योगदान है ।

देश की राजनीतिक जागरुकता में भी छात्र राजनीति का योगदान बड़ा है । छात्र राजनीति को सीमित करना भारतीय लोकतांत्रिक दृष्टि से सही फ़ेसला नहीं है । शिक्षण सस्थानो में ही वहवारिक शिक्षा की कमी होना शासन प्रणाली के प्रति अविश्वास जागृत करना सताधरियो की विचार पर प्रश्न चिन्ह लगा देता है । वास्तव में शिक्षा समाज का मार्ग दर्शक क्षेत्र है । शिक्षा क्षेत्र की जीमेवारी सामाजिक व्यवस्था को न्याय संगत स्वरूप देना है । सामाजिक एकता लाना है । यह कहा तक उचित है कि वर्तमान पीडी केवल किताबी संदेश ज्ञान पाकर सीमित रहे ।

क्या वर्तमान युवा पीढ़ी को हक़ नहि की वो अपने पक्षों को खुलकर रखे ?

क्या युवा वर्ग की आवाज़ को इस आधार पर दबाया जाएगा की राज काज का कार्य केवल राजनीतिक परिवारों और राजनीतिक जमात का है विद्यार्थी वर्ग का नहीं ? यह सवाल आज भी ज़हन में है की प्रत्यक्ष छात्र संघ चुनाव बंद करवाने की असल भावना क्या है । क्या वास्तव में छात्र अपने छात्र जीवन में राजनीति से दूर रहना चाहता है । या क्या छात्र राजनीति का स्तर बहुत निचले स्तर का है । अगर यह सचाई है तो असल जीमेवार क्या वर्तमान पीढ़ी है या लम्बे समय से चली आ रही छात्र राजनीति की परंपरा है ।

भारत में छात्र राजनीति के प्रति मानसिकता नकारतमक है । यह बात किसी से छिपी नहीं है । लेकिन दुनिया के सबसे बड़े युवा देश के बहुत से विश्वविधालय में छात्र संघ चुनाव बंद है । यह निर्णय किस क़दर सही है ।यह समझ से परे है । मंशा चाहे कुछ भी हो लेकिन सताधरियो का यह निर्णय दूरगामी नुक़सान का कारण बनेगा ।

आज बहुत बड़े वर्ग में राजनीतिक कार्यप्रणाली के विरोध में रोष होता है । बहुत बड़ी संख्या में जनता मत का प्रियोग नहीं करती हर वर्ष चुनाव आयोग शतप्रतिशत मतदान के लिए करोड़ों ख़र्च करता है लेकिन नतीजे कुछ ख़ास नहीं रहते है । बड़ा परिवर्तन नहीं आता है । असल में यह आविश्वास का कारण व्यवस्था के प्रति क्यू जागृत होता है ? बड़ा सवाल यह है । क्यूँकि राजनीतिक जमात नीति निर्माण की भूमिका में युवा वर्ग को स्वीकार नहीं करती राजनीति में युवा वर्ग को बड़ा महत्वता नहीं मिलती इस कारण नतीजे पक्ष में नहीं रहते जिस कारण राजनीतिक प्रणाली के प्रति अविश्वास और हीन भावना नज़र अति है । लेकिन जगत के सबसे बड़े लोकतंत्र में इस प्रक्रिया को गति तब मिलती है जब शासन वर्ग युवा वर्ग छात्र वर्ग को राजनीति में स्वीकार नही कर पाते है ।
छात्र राजनीति के योगदान को बड़े पमाने में स्वीकार भी नहीं किया जाता उनको केवल राजनीतिक दलो के पिचलगूँ के तोर पर ही समझा जाता है । लेकिन छात्र राजनीति का क्षेत्र योगदान दृष्टि बहुत व्यापक है । बहुत सार्थक है । छात्र नितियो छात्र समस्यो में सुधारवादी दृष्टि तो मूल में है लेकिन इसके बाहर सामाजिक मुद्दों पर जागरूक नज़रिया छात्र राजनीति के केंद्र में रहता है । प्रत्यक्ष छात्र संघ चुनाव देश के की राजनीतिक लोकतांत्रिक दृष्टि से बहुत ज़रूरी है । राजनीतिक संस्कृति राजनीतिक सामाजिककरण की दृष्टि से प्रयक्ष छात्र संघ चुनाव बहुत बड़ा महतब रखता है । छात्र राजनीति का योगदान वास्तव में अनदेखा हुआ है । इस सोच को बदलना पड़ेगा । हालाँकि इसके नकारात्मक पक्ष भी है लेकिन उसका स्थाई समाधान चुनाव बंद करवाना नहीं बल्कि व्यवस्था के भीतर व्यापक सुधार है ।

विनय छींटा
राजनीतिक शास्त्र विभाग
हिमाचल प्रदेश विश्वविधालय, शिमला