किसानों के खातों से जबरन काटा जा रहा फसल बीमा का प्रीमियम

किसानों के लिए बड़ी-बड़ी बातें करने वाली व्यवस्था की कथनी और करनी में अंतर है। इसका उदाहरण आजकल किसानों के ऋण खातों से जबरन काटा जा रहा फसल बीमा योजना का प्रीमियम है। बैंक ऐसा बीमा कंपनियों की जेबें गरम करने के लिए कर रहे हैं। इससे किसानों पर दोहरी मार पड़ी है, जहां दो महीने पहले ही उनसे साल भर का ब्याज एक साथ वसूल किया गया। अब फसल बीमा योजना का पैसा किसान क्रेडिट कार्ड से बैंक खुद ही काट रहे हैं।

हिमाचल प्रदेश में लाखों किसानों ने किसान क्रेडिट कार्ड पर फसली लोन लिया हुआ है। क्रेडिट कार्ड में किसानों का पैसा जमा रहता है, जब जरूरत पड़े तो वे इसे इस्तेमाल के लिए निकालते हैं। कोरोना संकट के व्याप्त होने के बाद बैंकों ने आरबीआई के निर्देश पर किसानों से मार्च महीने में पिछले सितंबर से लेकर ब्याज नहीं लिया।

इसे इस साल के सितंबर महीने तक के लिए टाल दिया गया। इसके बाद रबी की फसल की कटाई के बाद सितंबर महीने में साल भर का ब्याज एक साथ वसूलने के आदेश जारी किए गए। इससे लाखों किसानों को झटका लगा। साल भर पहले सरकार ने निर्देश जारी किए हैं कि फसल बीमा किसानों की इच्छा पर निर्भर करेगा।
यह जरूरी नहीं होगा, यह किसानों की इच्छा पर निर्भर करेगा। इसके बावजूद किसानों के खातों से प्रति एक लाख रुपये के कर्ज पर 800 रुपये के हिसाब से प्रीमियम काटना शुरू कर दिया गया है। बताया जा रहा है कि किसानों से इसके लिए अंडरटेकिंग ली हुई है, जब पुरानी अंडरटेकिंग को ही आधार बनाया जा रहा है, जब यह फसल बीमा जरूरी था।

बहुत से किसानों ने इसकी बैंकों में शिकायत भी की है। कई किसानों का कहना है कि एक ओर से प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि में उन्हें दो हजार रुपये उनके खातों में डाले जा रहे हैं। दूसरी ओर इसे बीमा कंपनियों की जेबें भरने के लिए काटा जा रहा है या किसानों को ब्याज में चुकता करना पड़ रहा है।

राज्य स्तरीय बैंकर्स कमेटी के प्रभारी पीके शर्मा ने कहा है कि फसल बीमा करवाना है कि नहीं, यह किसानों पर छोड़ा गया है। पहले यह सभी ऋणी किसानों का काटा जाना जरूरी था, मगर अब इसे ऑप्शनल रखा गया है। उन्होंने बैंकों की ओर से जबरन फसल बीमा योजना का पैसा काटने से अनभिज्ञता जताई।