आत्मनिर्भर

अब खा़मोश बैठा हूं
मूकदर्शक बना ।
हाथ कटे
जु़बान सिली है ,
मेरी उड़ान से ही
यह सजा़ मिली है ।
कभी उमंगें हिलोरें मारती
विश्वास साथ निभाता,
और रह-रह कर
दिमाग़ भी उकसाता,
क्यों किसी पर रहूं निर्भर ,
क्यों किसी से डर जाऊं ?
इस निर्भरता से छुड़ा लूं पिंड
क्यों ना कुछ ऐसा कर जाऊं ?
उनके चक्रव्यूह को भेद
मैं हो आत्मनिर्भर जाऊं !
पर आज
उन्हीं की बैसाखियों के सहारे
घसीट रहा हूं जि़न्दगी ।